Rare Scaleless Snake Found in Nagpur | नागपुर में बिना-खवलों वाले पानी के साँप की दुर्लभ खोज, वैश्विक स्तर पर दर्ज

Rare Scaleless Snake Found in Nagpur | नागपुर में बिना-खवलों वाले पानी के साँप की दुर्लभ खोज, वैश्विक स्तर पर दर्ज

Rare Scaleless Snake Found in Nagpur | नागपुर में बिना-खवलों वाले पानी के साँप की दुर्लभ खोज, वैश्विक स्तर पर दर्ज

नागपुर के सर्पमित्रों द्वारा रेस्क्यू किए गए बिना-खवलों वाले पानी के साँप पर किए गए शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज किया गया है। इस शोध लेखन को सोलापुर के सर्प अध्ययनकर्ता राहुल शिंदे ने तैयार किया है, जबकि इस दुर्लभ साँप का रेस्क्यू नागपुर के सर्पमित्र संतोष सोनी और गजू पटले ने किया था।

सामान्यतः साँपों सहित सभी सरीसृपों के शरीर पर खवले होते हैं। ये खवले बीटा-केराटिन (Beta-Keratin) नामक प्रोटीन से बने होते हैं, जो त्वचा को मजबूती देने, शरीर में पानी बनाए रखने तथा घर्षण, पराबैंगनी किरणों और शिकारियों से सुरक्षा देने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। हालांकि कुछ अत्यंत दुर्लभ मामलों में आनुवंशिक या पर्यावरणीय कारणों से इस प्रोटीन का निर्माण बाधित हो जाता है, जिससे साँप के शरीर पर खवले विकसित नहीं हो पाते। साँप के शरीर पर आंशिक या पूर्ण रूप से खवले न होने की इस स्थिति को अंग्रेज़ी में Scaleless और वैज्ञानिक भाषा में ‘मेरोलेपिडोसिस’ (Merolepidosis) कहा जाता है। यह अवस्था साँपों में बेहद दुर्लभ मानी जाती है।

नागपुर शहर के एक आवासीय क्षेत्र से पकड़े गए पानी के साँप में इसी प्रकार की दुर्लभ अवस्था पाई गई। इस मामले का गहन अध्ययन कर उस पर आधारित महत्वपूर्ण शोध लेख सोलापुर के सर्प अध्ययनकर्ता एवं शोधकर्ता राहुल शिंदे द्वारा अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘Reptiles & Amphibians’ में 26 जनवरी 2026 को प्रकाशित किया गया। इसके साथ ही यह भारत में पानी के साँप में मेरोलेपिडोसिस की पहली आधिकारिक वैज्ञानिक दर्ज हुई।

यह साँप 11 जुलाई 2024 को दोपहर लगभग 3:30 बजे नागपुर के निरंजन नगर, प्लॉट क्रमांक 203 स्थित एक घर से सर्पमित्र संतोष सोनी और गजू पटले को मिला था। साँप की कुल लंबाई लगभग 60 सेंटीमीटर थी। निरीक्षण के दौरान साँप की पीठ पर खवले न होने की बात स्पष्ट रूप से दिखाई दी। साँप असामान्य प्रतीत होने के कारण सोनी और पटले ने उसके छायाचित्र राहुल शिंदे को भेजे। तस्वीरों में साँप की पीठ पर मुलायम और झुर्रीदार त्वचा साफ दिखाई दे रही थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह मेरोलेपिडोसिस का ही मामला है।

अध्ययन के दौरान यह भी सामने आया कि इससे पहले पानी के साँप में इस प्रकार की कोई भी वैज्ञानिक दर्ज उपलब्ध नहीं थी। गहन जांच और दस्तावेज़ीकरण के बाद साँप को उसके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रूप से छोड़ दिया गया।

इससे पहले वर्ष 2021 में सोलापुर के एक औद्योगिक क्षेत्र से पाए गए दो नागों में बिना-खवलों की अवस्था (स्केललेस / मेरोलेपिडोसिस) दर्ज की गई थी। उस मामले पर राहुल शिंदे, अमित सय्यद, देवेंद्र भोसले और युनूस मणेर ने शोध किया था। यह भारत की पहली तथा विश्व में किसी भी नाग प्रजाति में दर्ज की गई पहली मेरोलेपिडोसिस की घटना थी।

इसके बाद वर्ष 2023 में गुजरात के पोरबंदर के एक औद्योगिक क्षेत्र से पाए गए एक तस्कर साँप में भी इसी प्रकार की अवस्था को व्यास द्वारा दर्ज किया गया। नागपुर में पाए गए पानी के साँप की यह दर्ज इस प्रजाति के लिए विश्व की पहली, जबकि भारत में मेरोलेपिडोसिस की तीसरी वैज्ञानिक दर्ज बनी है।

अब तक भारत में दर्ज किए गए मेरोलेपिडोसिस के सभी मामले औद्योगिक या अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों से ही सामने आए हैं। इसलिए इस शोध पत्र में पर्यावरण में मौजूद विषैले तत्वों के कारण वन्यजीवों के जीन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया गया है।

इस शोध कार्य में कोल्हापुर के देवेंद्र भोसले, ओंकार यादव, सांगली के युनूस मणेर, नागपुर के संतोष सोनी और गजू पटले तथा सोलापुर के अनिल अलदार का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है।


“मेरोलेपिडोसिस जैसी अवस्थाओं का अध्ययन करने से साँपों की त्वचा-विकास प्रक्रिया से जुड़े आनुवंशिक, जैव-रासायनिक और भ्रूणीय विकास संबंधी कारकों की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। भविष्य में ऐसी घटनाओं की तुलना और संभावित कारणों का पता लगाने के लिए इस प्रकार की शोध दर्ज अत्यंत आवश्यक होती हैं। यह सामूहिक प्रयासों के बिना संभव नहीं है। इस शोध के लिए सर्पमित्र संतोष सोनी और गजू पटले ने नमूने से संबंधित जानकारी और छायाचित्र उपलब्ध कराए, जबकि देवेंद्र भोसले, युनूस मणेर, ओंकार यादव और अनिल अलदार का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला। इन्हीं सबके योगदान से यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जा सका।”
सर्प अध्ययनकर्ता एवं शोधकर्ता राहुल शिंदे, सोलापुर

“नागपुर की रिहायशी बस्ती में मिले पानी के साँप की पीठ पर खवले नहीं थे। उसकी त्वचा सामान्यतः कठोर न दिखते हुए मुलायम और झुर्रीदार थी, जिससे स्पष्ट हो गया कि यह सामान्य मामला नहीं है। ऐसे दुर्लभ साँप की सही जानकारी और छायाचित्र तुरंत शोधकर्ताओं तक पहुँचाना आवश्यक था, इसलिए हमने यह दर्ज आगे के अध्ययन के लिए दी।”
सर्पमित्र संतोष सोनी, नागपुर

“सामान्यतः पानी के साँप में खवले स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, लेकिन नागपुर के निरंजन नगर में रेस्क्यू कॉल के दौरान संतोष और मुझे एक ऐसा अनोखा पानी का साँप मिला, जिसके शरीर पर खवले बिल्कुल नहीं थे। ऐसा साँप हमने पहले कभी नहीं देखा था। इसलिए उसे सुरक्षित रूप से संभालना, उसकी जानकारी विशेषज्ञों तक पहुँचाना और बाद में उचित प्राकृतिक आवास में छोड़ना हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।”
सर्पमित्र गजू पटले, नागपुर


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्र.1: यह शोध किस विषय पर है?
उ. यह शोध नागपुर में रेस्क्यू किए गए बिना-खवलों वाले पानी के साँप (पाणदिवड) में पाई गई दुर्लभ अवस्था मेरोलेपिडोसिस (Merolepidosis) पर आधारित है।

प्र.2: मेरोलेपिडोसिस क्या होती है?
उ. साँप के शरीर पर आंशिक या पूर्ण रूप से खवले न होने की स्थिति को अंग्रेज़ी में Scaleless और वैज्ञानिक भाषा में मेरोलेपिडोसिस कहा जाता है।

प्र.3: यह मामला क्यों खास माना जा रहा है?
उ. यह पानी के साँप की इस प्रजाति में दुनिया की पहली वैज्ञानिक दर्ज है और भारत में मेरोलेपिडोसिस की तीसरी शोधात्मक दर्ज है।

प्र.4: यह साँप कहाँ और कब मिला था?
उ. 11 जुलाई 2024 को दोपहर लगभग 3:30 बजे नागपुर के निरंजन नगर, प्लॉट क्रमांक 203 स्थित एक घर से यह साँप मिला था।

प्र.5: इस शोध को कहाँ प्रकाशित किया गया है?
उ. यह शोध 26 जनवरी 2026 को अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका Reptiles & Amphibians में प्रकाशित हुआ।

प्र.6: इस साँप की प्रमुख विशेषता क्या थी?
उ. साँप की पीठ पर खवले नहीं थे और त्वचा मुलायम व झुर्रीदार दिखाई दे रही थी, जो सामान्य पानी के साँप से अलग थी।

प्र.7: क्या इससे पहले भी ऐसे मामले भारत में मिले हैं?
उ. हाँ, 2021 में सोलापुर में दो नागों और 2023 में गुजरात के पोरबंदर में एक तस्कर साँप में ऐसी अवस्था दर्ज की गई थी।

प्र.8: यह अवस्था क्यों उत्पन्न होती है?
उ. शोध के अनुसार यह आनुवंशिक या पर्यावरणीय कारणों, विशेष रूप से प्रदूषण से जुड़े विषैले तत्वों के कारण हो सकती है।

प्र.9: क्या साँप को नुकसान पहुँचाया गया?
उ. नहीं। गहन अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण के बाद साँप को उसके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रूप से छोड़ दिया गया।

प्र.10: इस शोध का महत्व क्या है?
उ. यह शोध सरीसृपों की त्वचा-विकास प्रक्रिया, आनुवंशिक प्रभावों और पर्यावरणीय प्रदूषण के वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।


Rare Scaleless Snake Found in Nagpur


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